श्रीरामकथा दिनांक 2 से 6 दिसंबर
प्रवचन – पूज्य पं.उमाशंकर शर्मा व्यास


तुलसी मानस प्रतिष्ठान के प्रतिष्ठा पुरूष पंडित गोरेलाल शुक्ल स्मृति समारोह के अंतर्गत पंडित रामकिंकर सभागार में प्रथम दिवस पर परमपूज्य महाराजश्री पं. उमाशंकर व्यास ने प्रवचन प्रसंग के अतंर्गत कहा कि सभी भगवान को चाहते है लेकिन तुलसीदासजी कहते है कि हमें अपने हदय की निर्मलता होने पर ही भगवान हमें चाहते हैं। यही भक्ति की पराकाष्ठा है। आपने कहा कि श्रीरामचरितमानस में ऐसे कई भक्तों का वर्णन है जिनके अनन्य प्रेम के कारण प्रभु श्रीराम स्वयं उनके पास पहुंचे। इन भक्तों में महर्षियों, मुनियों के अलावा शबरी, निषाद, केवट भी हंै। आपने गीतावली का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे भक्तों में निषादराज की भगवान से इतनी निकटता रही कि श्री भरत के पास निषादराज के पत्र अयोध्या आते रहे। जिनमें प्रभु श्रीराम के वनवास का समाचार रहता था। आपने ‘सुमन’ शब्द की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि हम भगवान को सुमन (पुष्प) अर्पित करते हैं जिन्हें प्रभु प्रेम से स्वीकार भी करते हंै। इसीतरह भक्त का मन भी सु- अर्थात अच्छा मन होता है। उसके हृदय में भी भगवान विराजमान रहते है।
द्वितीय दिवस श्रीरामकथा में जनकपुर में महाराज जनक ने मुनि विश्वामित्रजी के साथ भगवान श्रीराम, श्रीलक्ष्मण को जो निवास दिया वह सीताजी का निवास था। आपने इसका अध्यात्मिक अर्थ बताते हुए कहा कि सीताजी साक्षात भक्ति है। और भक्ति ही भगवान का निवास होती है। आपने पुष्पवाटिका प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि जनकपुर की पुष्पवाटिका त्रेतायुग की पुष्पवाटिका है जहां भगवान ने न केवल पुष्प चुने, बल्कि सीताजी को भी दर्शन दिये। यह दर्शन का सौभाग्य सीताजी को भगवान के पुष्पवाटिका में पुष्प चुनने के कारण प्राप्त हुआ। पुष्प को हम साहित्य में सुमन भी कहते है। सुमन का एक अर्थ है जिनका मन पवित्र हो। आपने तुलसीदासजी के द्वारा रामकथा के रूपक प्रसंग का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘‘पुलक वाटिका बाग वन सुख सुविहंग विहारु, माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।’’ अर्थात जो कथा में रोमांच होता है वही बाग वन है। पक्षियों का विहार ही सुख है। निर्मल मन ही माली है। जो प्रेम रूपी जल से सुंदर नेत्रों द्वारा इसे सींचता है। इसका अध्यात्मिक अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि हम सब भी कथा सुनते हुए उसी पुष्पवाटिका का आनंद ले यही जीवन की सार्थकता है।


तृतीय दिवस कथा को विस्तार देते पुष्पवाटिका में सुमन की अद्भुत व्याख्या करते हुए श्रीराम चरितमानस में वृक्ष और पुष्प की बहुत सुंदर व्याख्या की गयी। गोस्वामी तुलसीदासजी वृक्ष के संबंध में कहते हैं कि पुष्पवाटिका में जहां सुगन्धित पुष्प खिले हुए है वहीं आम के वृक्षों में मोैर आ गये है। ऐसा लगता है कि जनकपुर की वाटिका में वसंत ऋतु स्थायी रूप से ठहर गयी है। इसका अध्यात्मिक अर्थ बताते हुए आपने कहा कि ऋतुओं में वसंत ऋतु सदा के लिए की अवधि भले ही दो माह की रहती हो लेकिन पुष्पवाटिका में तो ‘‘श्रद्धा रितु वसंत सम गाई ’’ के रूप में लुभा कर रह गयी। जहां श्रद्धा और भक्ति रहती है वहां व्यक्ति विनम्र रहता है। ऐसा विनम्र भाव व्यक्ति के जीवन में सदा बना रहना चाहिए जैसे वृक्षों के संबंध में कहा कि फलो के बोझ से वृक्ष की शाखाएं नीचे झुक जाती है इसका अर्थ है कि वे संसार को कुछ देने के साथ झुकना भी जानती हैं। इसे जड़ों की ओर लौटना भी कहा जा सकता है। इसलिए गोस्वामीजी उन्हें परोपकारी की संपत्ति की संज्ञा देते है। अर्थात यदि हमारे पास संपत्ति है तो हमें दूसरों को देते हुए अहंकारी नहीं होना चाहिए।
चतुर्थ दिवस परमपूज्य महाराज श्री ने कहा कि श्रद्धा ही मन को ‘सुमन’ बनाती है। श्रद्धा से ही श्रद्धेय के प्रति विश्वास उत्पन्न होता है। इसी श्रद्धा, विश्वास के समन्वय से ही हम अपने अंतरहृदय में ईश्वर के दर्शन कर सकते है। आपने ‘सुमन’ शब्द की व्याख्या करते हुए कहा अपने मन पर नियंत्रण रखपाना कठिन तो है लेकिन सत्संग के माध्यम से जब हम हृदय के विकारों पर नियंत्रण पा जाते हैं तो हमारा मन भी जितेन्द्रिय हो जाता है। ऐसा मन ही सुमन है जो भगवान को अत्यंत प्रिय है। इस संदर्भ में आपने कहा कि भगवान वस्तु के ही नहीं भाव के भूखे है। यद्यपि पूजन अर्चन में हम भगवान को विभिन्न वस्तुओं से अभिषेक करते हैं पर भगवान को निर्मल मन अत्यंत प्रिय है। वे श्रद्धा के माध्यम से ही किसी भी वस्तु को स्वीकार करते हैं।


समापन पर्व पर महाराजश्री ने कहा कि सीताजी पुष्पवाटिका में भगवान श्रीराम के लताओं की ओट से दर्शन करती है। उस समय उनकी भावदशा प्रेम की है। वर्णन आता है कि ‘मग लोचन रामहि उर आनी दीन्हे पलक कपाट सयानी’। अर्थात् सीता ने भगवान के स्वरूप को अपने नेत्रों के मार्ग से हदय में स्थित कर लिया। इसका आध्यात्मिक अर्थ है कि सीताजी भक्ति है और भगवान का निवास भक्त के हृदय में ही होता है। उसी तरह आपने भक्त सुतीक्ष्ण जी के प्रेम का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान के आगमन को सुनकर सुतीक्ष्णजी दर्शन के लिये मार्ग के बीच रास्ते में ही अचल होकर बैठ गये। वर्णन आता है कि उनके हृदय में भी भगवान का दिव्य स्वरूप आ गया। लेकिन जब स्वयं भगवान सामने आए तब भी सुतीक्ष्णजी ध्यानस्थ ही रहे। वे हृदय में भगवान के दर्शन करते रहे। जब भगवान श्रीराम ने स्वयं ही अपने राजरूप को उनके हृदय से छिपाकर अपना चतुर्भुज रूप दिखाया तब जाकर सुतीक्ष्णजी का ध्यान टूटा। इसका अर्थ है कि ईश्वर का एक निवास हम सबके हृदय में भी है। समापन पर आपने तुलसी मानस प्रतिष्ठान की सराहना करते हुए कहा कि पूर्व कार्याध्यक्ष श्री शुक्ल एवं श्री दुबे जी तथा वर्तमान कार्याध्यक्ष श्री रघुनंदन शर्मा जी के प्रभावी मार्गदर्षन में प्रतिष्ठान की प्रतिष्ठा दिनोंदिन नए आयाम स्थापित कर रही है। आपने सुधी श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। श्रीरामकथा में विभिन्न दिवस मुख्य अतिथि के रूप में मा.श्री कौशलेन्द्र विक्रम सिंह कलेक्टर जिला भोपाल, मा.श्री सीता सरण शर्मा पूर्व विधानसभाध्यक्ष एवं विधायक,मा. श्री धर्मेन्द्र लोधी, संस्कृति मंत्री मध्यप्रदेश शासन, मा.श्री सुरेश पचैरी पूर्व केन्द्रीय मंत्री भारत सरकार उपस्थित रहे। विभिन्न पुरस्कारों के क्रम में दिनांक 3 दिसंबर 2025 को डाॅ.लक्ष्मीनारायण गुप्त विश्वबंधु स्मृति पुरस्कार के अंतर्गत हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त छात्र श्री अरविन्द शर्मा,भोपाल को शाल श्रीफल,प्रशस्तिपत्र एवं पुरस्कार राशि मुख्य अतिथि परमपूज्य महाराजश्री एवं मा.श्री सीताशरण शर्मा के करकमलों से प्रदान की गयी।


दिनांक 5 दिसंबर 2025 को भाई रतनकुमार स्मृति पत्रकारिता के अंतर्गत पत्रकारिता में स्नातक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त छात्र श्री नमन अटोलिया,जयपुर को दिया गया इसी अनुक्रम में जस्टिस आर.डी.शुक्ल स्मृति पुरस्कार के अंतर्गत विधि संकाय में प्रथम स्थान प्राप्त छात्रा कु.हर्षिता शर्मा को पूज्य महाराज श्री एवं मुख्य अतिथि मा.श्री सुरेश पचैरी के द्वारा पुरस्कृत किया गया। पुस्तक विमोचन की श्रृंखला में तुलसी मानस प्रतिष्ठान मध्यप्रदेश विधान तथा नियमोपनियम की पुस्तक का विमोचन मुख्य अतिथि द्वारा किया गया। इसी अनुक्रम में डाॅ.गौरीशंकर शर्मा गौरीश द्वारा रचित ‘श्री जनकसुता सुत-शौर्य कृति का विमोचन भी किया गया। श्री अशोक धमेनिया की दो पुस्तकें ‘महाकंुभ 2025 प्रयागराज’ एवं यायावर की डायरी का विमोचन मा.अतिथि द्वारा किया गया। तुलसी मानस भारती की माह दिसम्बर 2025 की पत्रिका का विमोचन एवं श्रीमती ज्योत्सना तिवारी की काव्यकृति ‘धूप-छांव’ का विमोचन मुख्य अतिथि एवं परमपूज्य महाराजश्री के करकमलों द्वारा किया गया। कार्यक्रम में कैलाश शर्मा के चित्रों का भी विमोचन किया गया।


समापन दिवस पर परमपूज्य महाराजश्री का सम्मानशाल/श्रीफल से किया गया इस अवसर पर कार्याध्यक्ष श्री रघुनंदन शर्मा, सचिव कैलाश जोशी, श्री माधव सिंह दांगी, संपादक तुलसी मानस भारती श्री देवेन्द कुमार रावत, श्री प्रहलाद दास मंगल उपस्थित थे।
कथा प्रसंग में विभिन्न अवसरों पर पधारे सुधी दर्शकों के अलावा सचिव श्री कैलाश जोशी, प्रभुदयाल मिश्र प्रधान संपादक तुलसी मानस भारती, श्री विजय अग्रवाल कोषाध्यक्ष, श्री राजेन्द्र शर्मा संयोजक, श्री माधव सिंह दांगी, श्री कमल नारायण शुक्ल एवं श्रीमती सुशीला शुक्ला, श्री राजेश श्रीवास्तव, श्री राजेश हिगोंरानी, श्री कमलेश जैमिनी, श्री एल.एस.चैधरी एसडीएम, श्री कुलदीप खरे, श्री अरूण गुप्ता, श्रीमती श्रद्धा गुप्ता, श्री अतुल गुप्ता, श्रीमती मधु गुप्ता, श्रीमती नीता गुप्ता, श्री महेश दुबे, श्री गोपाल सिंह राजपूत, कु. त्रिशा जोशी, ओमप्रकाश गौर, श्री अशोक धमेनिया, श्री माघवसिंह दांगी, श्रीमती नीता दांगी, सुश्री राजकुमारी शर्मा, श्री महेश सक्सेना, सुश्री शारदा राठौर, श्री जे.पी. विश्वकर्मा, श्रीमती कविता अग्रवाल, श्री कैलाश शर्मा, श्री प्रहलाद दास मंगल, सुश्री मृदल त्यागी, श्री रमेश गुर्जर, श्री संजीव पुरी एवं श्रीमती संध्या पुरी, श्री अरूण गुप्ता, श्रीमती श्रद्धा गुप्ता, श्री बी.के.सांघी, श्री गिरधारीलाल बेवू भाई उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन श्री माधव सिंह दांगी ने किया। आभार प्रदर्शन श्री देवेन्द्र कुमार रावत ने किया।

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