हमारे बारे में

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भारत सरकार द्वारा गोस्वामी तुलसीदास रचित कालजयी रचना ‘‘रामचरित मानस’’ के 400 वर्ष होने पर सम्पूर्ण देश में रामचरित मानस के चतुश्शताब्दी समारोह का आयोजन किया गया था। मध्यप्रदेश में इस कार्यक्रम को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए शासन द्वारा श्री रामचरित मानस चतुश्शताब्दी समारोह समिति का पंजीयन क्रमांक 1726 दिनांक 8 जून 1970 को किया गया। समिति के अध्यक्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय श्री प्रकाशचंद सेठी, अध्यक्ष वनमंत्री माननीय श्री शंभुनाथ शुक्ल एवं महामंत्री श्री गोरेलाल शुक्ल मनोनीत किये गये थे। समिति में गणमान्य नागरिक श्री त्रिभुवन यादव, श्री माधुरी सरन अग्रवाल, श्री आर. के. इन्दौरिया, श्री मदनमोहन जोशी, श्री पुरुषोत्तम काबरा, श्री कोमलसिंह राठौर, श्री आर. एन. वाजयेपी, श्री वीरेन्द्र तिवारी, श्री विनोद गुप्ता, श्री बाबूलाल भानपुर, श्री विजय बोन्द्रिया, श्री बी. एल. दिवाकर, श्री ईशनारयण जोशी आदि थे। आयोजन चूंकि चतुश्शताब्दी वर्ष तक सीमित था अतः देश के अन्य भागों में इसका विधिवत समापन हो गया, किन्तु माननीय श्री शंभुनाथ शुक्ल तथा श्री गोरेलाल शुक्ल की बहुआयामी योजना के कारण प्रबंधकारिणी समिति ने निर्णय लिया कि चतुश्शताब्दी को हटाकर संस्था का नाम ‘तुलसी मानस प्रतिष्ठान मध्यप्रदेश’ किया जावे।

मानस भवन - परिकल्पना एवं निर्माण
वर्ष 1970 में भारत सरकार द्वारा जब रामचरित मानस की चतुश्शताब्दी मनाने का संकल्प लिया गया तभी उसके उद्देश्यों में यह प्रमुखतः समाहित था कि मानस और तुलसी साहित्य की अभिवृद्धि के पावन उद्देश्य को क्रियात्मक रूप देने के लिए प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों में ‘‘मानस भवन’’ स्थापित किए जायें। 
 
तुलसी मानस प्रतिष्ठान मध्यप्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष (स्व.) श्री गोरेलाल शुक्ल तभी से मानस और तुलसी की गरिमा के अनुरूप मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में ‘मानस भवन’ के निर्माण के लिए कृत संकल्प थे। 

श्री शुक्ल के सतत प्रयास से माननीय अर्जुन सिंह (मुख्यमंत्री) के कार्यकाल में नगर के मध्य भाग में स्थित श्यामला हिल्स भोपाल पर मानस भवन के लिये एक एकड़ भूमि आरक्षित की गई। श्री वीरेन्द्र तिवारी के सतत् प्रयासों से इसी से लगी पौन एकड़ भूमि का आरक्षण पूर्व राज्यमंत्री श्री विष्णु राजौरिया ने किया। इसमें मुख्यमंत्री सचिवालय के तत्कालीन सविच श्री एन. बी. लोहानी एवं तत्कालीन राजस्व सचिव श्री कृपाशंकर शर्मा का विशेष योगदान रहा। 

माननीय श्री सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने न केवल अनुदान की राशि रु. अस्सी हजार वार्षिक से बढ़ाकर रूपये दो लाख की अपितु श्री लक्ष्मीनारायण शर्मा, तत्कालीन राजस्व मंत्री की पहल पर उक्त पौने दो एकड़ भूमि भी मात्र एक रुपये प्रतिवर्ष के भूभाटक पर प्रदान की। इस समझ राज्यपाल के तत्कालीन सलाहकार श्री एम. नटराज (आर. पी. एस.) का योगदान भी अमूल्य रहा। 
 
भूमि आवंटन पर पूर्व से ही न्यायालय के स्थगन आदेश से छूट प्राप्त करने तथा पुनः हाईकोर्ट जबलपुर से आवंटन संबंधी अपील के निर्णय तक श्री एस. सी. गोधा, एडवोकेट एवं श्री एस. के. दीक्षित महाविधवक्ता ने प्रतिष्ठान को उदारतापूर्वक निःशुल्क सेवायें उपलब्ध कराईं।
 
अतिक्रमण हटवाने तथा आधिप्त्य प्राप्त करने में श्री सुखदेव प्रसाद दुबे सेवानिवृत आइ. ए. एस. श्री मोहन शुक्ल आय.पी.ए., श्री कवीन्द्र कियावत (तत्कालीन नजूल अधिकारी) एवं श्री चंद्रावत (टाउन इंस्पेक्टर) से उल्लेखनीय सहयोग मिला। 
 
पूर्व मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल ने भवन निर्माण के लिए उदारतापूर्वक रूपये पांच लाख का अनुदान स्वीकृत किया, जिससे निर्माण-कार्य प्रारम्भ करना संभव हुआ। स्व. श्री नरसिंहराव दीक्षित के सद्प्रयासों से श्री मोतीलाल वोरा राज्यपाल उत्तरप्रदेश के कार्यकाल में उ. प्र. शासन से एक मुश्त बीस लाल रूपये का अनुदान मिला। जिससे प्रतिष्ठान के विकास को गति मिली।
18 दिसम्बर, 89 को पूज्यपाद पं. रामकिंकर उपाध्याय द्वारा निर्माण स्थल का भूमि पूजन हुआ। इस अवसर पर श्री गोरेलाल शुक्ल के उद्गार थे : आज का यह अवसर समिति (अब प्रतिष्ठान) के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा। जिस प्रकार प्रस्तर से गंगा प्रवाहित होती है उसी प्रकार बीस वर्षों की कठोर साधना के बाद मानस भवन के रूप में यह गंगा प्रवाहित हुई, जिसमें पं. रामकिंकर उपाध्याय की भूमिका भगीरथ की रही। श्री शुक्ल ने पं. उपाध्याय से आशीर्वचन मांगा कि ‘‘मानस भवन इंर्ट पत्थर का अंबार न होकर उसमें वास्तविक प्राण-प्रतिष्ठा हो।’’
इन्हीं भावनाओं के अनुरूप भूमि पूजन करते हुए पं. उपाध्याय ने कहा कि ‘जब हम भूमि का पूजन करते हैं तो उसका अर्थ होता है कि भूमि जड़ नहीं अपितु चेतन है। इसलिए भगवान विष्णु की एक पत्नी भूदेवी भी है। आपने आशा व्यक्त की कि ‘इस भूमि पर बनने वाला भवन केवल इंर्ट पत्थर का संचय मात्र न हो अपितु वह ऐसी प्राण प्रतिष्ठा से मंडित हो, जिसकी ऊर्जा से सामाजिक सद्भावना, ऐक्य, सदाचार ओर मानव मूल्यों की रश्मियां आलोकित हो उठें।’
प्रतिष्ठान की परिकल्पना और पं. उपाध्याय के मनोरथ के अनुरूप मानस-भवन की रूपरेखा सुनिश्चित करने के लिए एक ‘निर्माण समिति’ गठित की गई जिसमें-
  • स्व. श्री गोरेलाल शुक्ल (कार्यकारी अध्यक्ष)
  • श्री एम. पन. बुच, आई. ए. एस. सेवानिवृत्त
  • श्री एल. एच. भाटिया, पूर्व सचिव, लोक निर्माण विभाग मध्यप्रदेश (दिवंगत)
  • श्री एस. नगाइच, पूर्व प्रमुख अभियंता, लोक निर्माण विभाग मध्यप्रदेश 
  • श्री सी. वी. कांड, पूर्व प्रमुख अभियंता, लोक निर्माण विभाग मध्यप्रदेश 
  • श्री टी. एस. घाटे, वास्तुविद (रायपुर)
  • श्री दिलबागराय गांधी, प्रमुख उद्योगपति, मध्यप्रदेश
  • श्री डी. पी. गोस्वामी, उपाध्यक्ष समाज कल्याण परिषद, मध्यप्रदेश 
  • श्री बी. एल. दिवाकर, वरिष्ठ पत्रकार
  • श्री रमाकांत दुबे (कार्याध्यक्ष)। 
उपसमिति द्वारा मानस भवन का सम्पूर्ण कंसेप्ट प्लान तैयार किया गया जिसे प्रबंधकारिणी समिति की 25 जनवरी 92 की बैठक में स्वीकृति प्राप्त हुई। इस निर्माण कार्य के सतत् पर्यवेक्षण के लिए एक तकनीकी उपसमिति गठित की गई, जिसमें निम्नलिखित सदस्य रहे 
  • श्री एल. एच. भाटिया
  • श्री एस. नगाइच
  • श्री सी. वी. कांड 
  • श्री दिलबागराय गांधी 
निर्माण कार्य की गुणवत्ता का दिन प्रतिदिन पर्यवेक्षण श्री कांड द्वारा निःशुक्ल किया गया है। 

निर्माण के अतिरिक्त मानस-भवन के लिए धन-संग्रह को गति प्रदान करने के लिए एक धन संग्रह उपसमिति का भी गठन किया गया, जिसमें निम्नलिखित महानुभाव रहे –

  • श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा, पूर्व कृषिमंत्री, मध्यप्रदेश
  • श्री नरसिंहराव दीक्षित, पूर्व उद्योग/कृषिमंत्री, मध्यप्रदेश (दिवंगत)
  • श्री राजेन्द्र कुमार इन्दौरिया, उद्योगपति एवं समाज सेवी
  • श्री बी. एल. दिवाकर, वरिष्ठ पत्रकार
  • श्री माधुरीसन अग्रवाल, उद्योगपति एवं समाजसेवी
  • श्री शलभ शर्मा, उद्योगपति
  • श्री विश्वामित्र शर्मा, उद्योगपति एवं समाजसेवी
  • श्री एस. एल. छाजेड़ चार्टर्ड एकाउंटेंट।